शनिवार, 30 जुलाई 2022

जैन समाज ने जैन महापुरुषों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया था?

 -महावीर सांगलीकर 

jainway@gmail.com


यह लेख लिखने का मेरा उद्देश्य यह है की आज के जैनियों को, विशेष कर युवकों को यह पता चले कि जैन समाज के महापुरुष अपने समय से कितने आगे थे और उस समय के दकियानूसी जैनियों ने उनके साथ किस प्रकार का अभद्र व्यवहार किया था.


आजकल कई जैन युवक सोशल मिडिया में जैन महापुरुषों और अन्य प्रसिद्ध जैन व्यक्तियों का गुणगान करने का काम कर रहें हैं. जैसे कि लाला लजपत राय, कर्मवीर भाऊराव पाटील, व्ही. शांताराम, डॉ. विक्रम साराभाई, वा. रा. कोठारी, वालचंद हीराचंद, कल्याणजी आनंदजी, अभिनन्दन वर्धमान आदि.

मजे की बात यह है कि गुणगान का मेसेज तैयार करनेवाले यह जैन युवक इन सब महापुरुषों के नाम के आगे जैन शब्द भी जोड़ देते हैं! जैसे कि लाला लजपत राय (जैन), कर्मवीर भाऊराव पाटील (जैन), व्ही. शांताराम (जैन), डॉ. विक्रम साराभाई (जैन), अभिनन्दन वर्धमान (जैन) आदि. वास्तव में इनमें से कोई भी व्यक्ति अपने नाम के आगे जैन शब्द नहीं लिखते थे और ना ही उनको ऐसा लिखने की जरुरत थी, क्यों कि यह लोग नामधारी जैन नहीं थे, बल्कि आचरण से जैन थे.

यह सारे लोग तो महान थे, जिनसे आज के किसी भी जैन की तुलना नहीं की जा सकती.

यह लेख लिखने का मेरा उद्देश्य यह है की आज के जैनियों को, विशेष कर युवकों को यह पता चले कि यह सारे महापुरुष अपने समय से कितने आगे थे और उस समय के दकियानूसी जैनियों ने उनके साथ किस प्रकार का अभद्र व्यवहार किया था.

●  लाला लजपत राय एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे. वह आधुनिक विचारों के थे. उनके आधुनिक विचारों के कारण जैनियों से उनकी पटती नहीं थी. जैनियों से होनेवाले विवादों के कारण आखिर लाला लजपत राय जी ने जैन धर्म छोड़ दिया और वह आर्यसमाजी बन गये.

● व्ही. शांताराम एक महान फिल्मकार थे. भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के विकास में उनका योगदान सराहणीय है. इन्होनें आंतरजातीय विवाह किया था. आंतरजातीय विवाह के कारण जैन समाज ने इन्हें समाज से बहिष्कृत किया था.

● कर्मवीर भाऊराव पाटील ने बहुजन समाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार किया. इनकी उठ-बैठ दलितों के साथ होती थी. इस कारण जैन समाज इनसे द्वेष करता था. जैन समाज के लोगों ने इनका प्रचंड विरोध किया. वास्तव में कर्मवीर भाऊराव पाटील के महान कार्य में जैन समाज का योगदान नहीं के बराबर था. इसके उलटे महाराष्ट्र के मराठा समाज ने उनके कार्य में बड़ी मदद की थी. 

मैंने देखा है की कर्मवीर भाऊराव पाटिल का गुणगान करनेवाले ज्यादातर जैनी कर्मवीर के विचारों की अवहेलना करते रहते हैं.

● वा.रा. कोठारी महाराष्ट्र के एक महान समाज सुधारक थे. वह विधवा विवाह के समर्थक थे. एक जैन अधिवेशन में उन्होंने मंच से विधवा विवाह का समर्थन किया. तब जैनियों ने उनकी धोती उतार दी थी.

अब कुछ लोग कहेंगे कि यह सब पुरानी बातें हो गयी. ठीक है, लेकिन क्या आज के जैनी समय के आगे की सोचते हैं, जैसा कि यह सारे महापुरुष सोचते थे?

मेरा जैन युवकों से प्रश्न है कि क्या उनमें महापुरुष बनने की क्षमता है? क्या उनमें हिम्मत है कि ओछी धार्मिकता, धार्मिक कट्टरता से बाहर आकर कुछ बड़ा कर दिखाएं? अगर आपको महान बनना है तो आपको सबसे पहले दकियानूसी विचारों और लोगों से दूर रहना होगा. याद रहें कि महान बनने के लिए आपको तथाकथित धार्मिकता से दूर रहना होगा. धर्म कर्मकांडो में, मंदिर जाने में, दकियानूसी रीतिरिवाजों के पालन में नहीं होता है.

उठो, महान बनो! समय से आगे की सोचो! जो समय से आगे की सोचते हैं, वहीं महान बनते हैं! याद रहें कि कर्मवीर भाऊराव पाटिल हो या विक्रम साराभाई, या अन्य कोई भी जैन महापुरुष मंदिर, साधू आदि से दूर ही रहते थे. ना ही इनमें तथाकथित धार्मिकता के प्रति लगाव था.




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गुरुवार, 28 जुलाई 2022

क्या भगवान महावीर ब्राह्मण विरोधी थे? क्या जैन धर्म ब्राह्मण विरोधी है?

महावीर सांगलीकर 

Phone: 8149703595


कुछ बहुजनवादी विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता कहते रहते हैं कि भगवान महावीर ब्राह्मणों के विरोधी थे. उन्होंने वैदिक धर्म के विरोध में जैन धर्म की स्थापना की. इन विद्वानों और कार्यकर्ताओं द्वारा अक्सर कहा जाता है कि द्वारा कहा जाता है कि वैदिक ब्राह्मण यज्ञो में पशुबली देते थे, वैदिक धर्म के कारण समाज में उच-नीचता पनप रही थी, ब्राह्मणवाद समाज पर हावी हो गया था, इसीलिये भगवान महावीर ने जैन धर्म की स्थापना की और उसके माध्यम से ब्राह्मणों का विरोध किया.

लेकिन सच्चाई क्या है?

पहली बात तो यह है कि भगवान महावीर ने जैन धर्म की स्थापना नहीं कि थी. जैन धर्म, उसके मुलभूत विचार भगवान महावीर के पहले से ही चले आ रहे थे. भगवान महावीर जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर थे और उनके समय 23 वे तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की परंपरा के अनुयायी बडी संख्या में मौजूद थे. प्राचीन जैन और बौद्ध साहित्य में इसके अनेक उल्लेख दिखाई देते हैं. वेदों में भी जैन परंपरा का उल्लेख मिलता है. उससे पूर्व, सिन्धु घाटी की सभ्यता में जैन परंपरा अस्तित्व दिखाई देता है. इस कारण भगवान महावीर ने जैन धर्म की स्थापना की ऐसा कहना गलत साबित होता है.

यह सच है कि भगवान महावीर पशुबली के विरोधी थे, कर्मकांड के विरोधी थे और इन बातों समर्थन करने वाले वेदों को वह नहीं मानते थे. लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि भगवान महावीर ब्राम्हणों के विरोधी थे. उस समय समाज में दो प्रकार के ब्राम्हण थे. कर्मकांडी ब्राम्हण, जो कर्मकांड में ही विश्वास रखते थे, और ज्ञानकांडी ब्राम्हण, जो ज्ञान और चिंतन को महत्व देते थे. ज्ञानकांडी ब्राम्हण खुद आगे आ कर भगवान महावीर से जुड गए. उन्होंने भगवान महावीर के विचारों को समाज में फैलाया. दूसरी ओर कर्मकांडी ब्राम्हणों का प्रबोधन कर उन्हें सही रास्ते पर लाया.

भगवान महावीर के 11 प्रमुख शिष्य थे, जिन्हें गणधर कहा जाता है. यह सभी गणधर ब्राह्मण थे. इसलिए भगवान महावीर को ब्राह्मणों का विरोधी बताना एक गलत बात है.

आगे का इतिहास देखते है तो पता चलता है कि कई महान जैन आचार्य जन्म से वैदिक ब्राम्हण थे, जिन्होंने पूरे भारत में या अपने-अपने प्रदेशों मेंजैन धर्म को फैलाया. उनकी एक लम्बी लिस्ट है, जिसे यहां देना संभव नहीं है.

ना भगवान महावीर ब्राह्मण विरोधी थे, और ना ही जैन धर्म ब्राह्मण विरोधी है. जैन धर्म में सभी जाती और वर्ण के लोगों को स्थान है. यह बात अलग है कि जैन धर्म में ब्राह्मण व्यक्ति को ब्राह्मण होने के कारण कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया है. और यह केवल सैद्धांतिक स्तर पर नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष में भी दिखाई देता है. चूं कि यहां ब्राम्हणों की बात चल रही है, मैं एक और बात बताना चाहूंगा. आज भी दक्षिण भारत की कुछ ब्राह्मण जातियां, गुजरात-राजस्थान-मध्य प्रदेश कुछ ब्राह्मण जातियां परंपरा से जैन धर्म का पालन करती हैं. कुछ ऐसी भी ब्राह्मण जातियां हैं, जो जैन और वैदिक इन दोनों धर्मों का पालन करती हैं. और उससे भी बड़ी बात यह है कि आज के कई जैन मुनि ब्राह्मण समाज से आये हुए हैं.

मैं बहुजनवादी विद्वांनो से अपील करता हूं कि उनको ब्राह्मण विरोध के लिए भगवान महावीर और जैन धर्म का उपयोग करना बंद कर देना चाहिए. उनको चाहिए कि जैन दर्शन को ठीक से जान लें, पता चलेगा कि वहां किसी भी जाती या समाज का विरोध नहीं किया गया है.

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बुधवार, 27 जुलाई 2022

सम्राट अशोक और उसका बौद्ध धर्मान्तरण

© महावीर सांगलीकर

 

सम्राट अशोक यह मौर्य राजवंश का तिसरा सम्राट था. वह मौर्य राजवंश के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त का पोता, और सम्राट बिंदुसार का पुत्र था. 

सम्राट अशोक ने अपने पडोसी राज्य कलिंग पर आक्रमण किया था. इस युद्ध में दोनों तरफ के लाखों सैनिक मारे गये.  इस कारण अशोक के मन में हिंसा के प्रति नफरत तैयार हो गयी और उसने बौद्ध धर्म का अंगीकार किया, ऐसा माना जाता है. 

यहां गौर करने लायक एक विशेष बात यह कि बौद्ध धर्म का अंगीकार करने से पहले सम्राट अशोक किस धर्म का अनुयायी था इस बात की चर्चा कोई नहीं करता. कई लोग  सोच सकते हैं कि सम्राट अशोक ने हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म  को अपनाया. लेकिन उस समय (और आगे भी हजारों साल) हिन्दू नाम का कोई धर्म अस्तित्व में ही नहीं था. मगध साम्राज्य  में उस समय जैन, बौद्ध, आजीवक, ब्राह्मण (वैदिक) आदि धर्म थे. बौद्ध धर्म अपनाने से पहले सम्राट अशोक का वैदिक ब्राह्मण होने का कोई सवाल ही नहीं उठता. ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि पहले सम्राट अशोक या तो जैन था, या फिर आजीवक. 

लेकिन क्या सम्राट अशोक सचमुच अस्तित्व में था? अगर था, तो क्या उसने बौद्ध धर्म को सचमुच अपनाया था? सच कुछ और है. 

सम्राट अशोक नाम का कोई राजा वास्तव में अस्तित्व में था, कलिंग के युद्ध में हिंसा के कारण सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया यह कहानी केवल बौद्ध धर्म के कुछ ग्रंथों में उपलब्ध है. इस कहानी का समर्थन करने वाला दूसरा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. जिन्हें अशोक के शिलालेख कहा जाता है, ऐसे किसी भी शिलालेख में अशोक नाम का दिखाई नहीं देता है. इन शिलालेखों के अनुसार जिसने वह लिखे उसका नाम  ‘देवानाम पियं पियदस्सी’ था. बौद्ध ग्रन्थ पियदस्सी को ही सम्राट अशोक मानते हैं, लेकिन इस मानाने के पीछे कोई तर्क या प्रमाण नहीं है. वास्तव में  पियदस्सी के किसी भी शिलालेख के अनुसार सिद्ध नहीं किया जा सकता की उसने बौद्ध धर्म को अपनाया था. 

जिन्हें सम्राट अशोक के शिलालेख कहा जाता है, वह सारे के सारे सम्राट अशोक ने ही लिखवाये थे इस बात के लिए आधुनिक इतिहासकार मानने के लिए तैयार नहीं है, क्यों कि इन विभिन्न शिलालेखों के कालक्रम में बडा अन्तर है. 

समकालीन बौद्ध, जैन और वैदिक ग्रंथों में और विदेशी यात्रियों के यात्रावृत्तों में अशोक का कोई उल्लेख नहीं है. सम्राट अशोक की कथा सबसे पहले 'अशोकवदन' इस बौद्ध ग्रन्थ में पायी जाती है,  जो इसा की दूसरी सदी में लिखा गया था, यानि कथित सम्राट अशोक के पांच शताब्दियों बाद! का . उसके बाद चौथी सदी के महावंश और पांचवी सदी के दीपवंश इन बुद्ध ग्रंथों में सम्राट अशोक की कथा पायी जाती है. यह सारे ग्रन्थ समकालीन न होने के कारण और इनमें दी गयी जानकारी के कोई बाहरी प्रमाण न होने के कारण हम सम्राट अशोक की कहानी को प्रामणिक नहीं मान सकते. 

प्राचीन जैन ग्रंथों में मौर्य राजवंश के चन्द्रगुप्त, बिन्दुसार, कुणाल, सम्प्रति का और मगध के कई अन्य प्रमुख लोगों का विस्तार से वर्णन है, लेकिन अशोक का वर्णन नहीं है ऐसा क्यों?

गौर करने लायक एक महत्वपूर्ण बात यह है कि समकालीन ग्रीक इतिहास में  सम्राट चन्द्रगुप्त के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन ग्रीक स्रोत देखील सम्राट अशोकाचा कोई उल्लेख नहीं करते. 

यह सारी बातें सम्राट अशोक के अस्तित्व पर ही सवाल खडा कर देते हैं.  




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रविवार, 26 सितंबर 2021

जैन क्या है? हिंदू क्या है? क्या जैन हिंदू है?

© महावीर सांगलीकर 

Phone: 8149703595 

जैन धर्म और हिंदू धर्म, जैन समाज और हिंदू समाज क्या अलग अलग है? या एक ही है? कई लोग इनको अलग-अलग मानते हैं, तो कई लोग दोनों को  एक ही मानते है. इस विषय के बारे में लोगों में ढेर सारी गलतफहमियां हैं, जो जादातर अभिनिवेश, कट्टरता, पूर्वाग्रह और अज्ञानता के कारण है. सच्चाई जानने के लिये हमें तटस्थ भाव से विचार करना पडेगा. 

तो आईये, सबसे पहले हम  देखते हैं कि जैन क्या है? और हिंदू क्या है?

हिंदू क्या है?

भारत के संविधान में, कानून में, जन गणना में  हिंदू यह एक धर्म माना गया है. समाज भी ऐसा ही मानता है. यह ठीक ही है. लेकिन हिंदू यह किसी एक धर्म का नाम नहीं है, बल्कि हिंदू कई अलग अलग धर्म और संप्रदयों के एकत्रित समूह का नाम है. हिंदू धर्म के अंतर्गत शैव, वैष्णव, शाक्त, स्मार्त आदि प्रमुख संप्रदाय और दर्शन आते है. इन सबकी मुख्य देवतायें अलग अलग है. जैसे कि शैवों की मुख्य देवता शिव है, जब कि वैष्णवों की मुख्य देवता विष्णु है.   

भारत के किसी भी प्राचीन धार्मिक या अन्य साहित्य में हिंदू इस शब्द का प्रयोग धर्म के अर्थ में किया नहीं गया है. वास्तव में हिंदू यह शब्द एक प्रदेश वाचक शब्द है. इस शब्द का संबंध सिंधू इस शब्द से और सिंधू घाटी की सभ्यता से है. अरबी और फारसी भाषा में हिंदू शब्द का अर्थ प्रदेश वाचक ही है. हिंदू शब्द का सीधा -साधा अर्थ 'भारतवासी' या 'हिंदुस्थानी' यही है!  मतलब साफ है, हर भारतवासी हिंदू ही है, लेकिन केवल तब, जब हिंदू इस शब्द का प्रयोग धर्म के अर्थ में नहीं  किया जाता! 

जैन क्या है?

जैन एक धर्म है, ना कि कई अलग अलग धर्मो और विचार धाराओं का समूह. जैन यह प्रदेशवाचक शब्द भी नहीं है. यह शब्द 'जिन'  इस प्राचिन भारतीय शब्द से बना है, जिसका अर्थ है  'जिसने अपने विकारों को जीत लिया'. जो लोग जिन के अनुयायी, वही जैन है. 

क्या जैन हिंदू है? 

तो क्या जैन हिंदू है? इसके दो उत्तर है. पहला उत्तर यह है कि जैन हिंदू ही है, अगर हिंदू शब्द का अर्थ प्रदेशवाचक है. लेकिन अगर हिंदू का मतलब धर्म है, तो जैन हिंदू नहीं है! क्यों कि जैन ना तो शैव है, और ना ही वैष्णव, और ना ही वह हिंदू धर्म के अंतर्गत आनेवाले किसी भी संप्रदाय के अनुयायी.  

जैन मुनि और हिन्दू साधू एकसाथ 


वास्तवता पर  ध्यान दें ..... 

लेकिन यहां हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिये  समाज के तौर पर जैन समाज और हिंदू समाज कोई अलग अलग समाज नहीं है. इसे सहजता से सिद्ध किया जा सकता है.  

● हमें इस बात को हमेशा ध्यान में रखना होगा कि जैन समाज के कई सारे अनुयायी एक तरफ जैन धर्म का पालन करते हैं, तो दूसरी ओर हिंदू धर्म का भी पालन करते हैं. इसी प्रकार हिंदू समाज के कई सारे लोग एक ओर हिंदू धर्म पालन करते हैं तो दूसरी ओर जैन धर्म का भी पालन करते हैं.  

●  दोनों धर्मों की संस्कृति में कई सारी समानताएं हैं.  

● भारत के कई राजवंशों में जैन और हिंदू यह दोनों धर्म पाले जाते थे.  जैसे कि चालुक्य, राष्ट्रकूट, गंग, कदंब, होयसल, शिलाहार, देवगिरि के यादव, सिसोदिया, चौहान आदि. 

●  भगवान ऋषभदेव, राम, कृष्ण, आदि महापुरुष जैन और हिन्दू इन दोनों धर्मों  के अनुयायियों के लिये पूजनीय हैं.  भगवान शिव और भगवान ऋषभदेव में इतनी सारी समानतायें है कि कई लोग इन्हे एक ही व्यक्ति मानते हैं.  जैन धर्म के 23 वे तीर्थंकर नेमिनाथ और भगवान श्रीकृष्ण चचेरे भाई थे. 

●  इतिहास साक्षी है जैन समाज के कई सारे महान आचार्य, साधू, साध्वियां,  मुनिगण आदि का जन्म जैन घरों में नहीं बल्कि हिंदू  घरों में हुआ था. आज भी जैन धर्म के कई आचार्य, साधू-साध्वियां आदि जन्म से जैन नहीं हैं, बल्कि उनका जन्म हिंदू घरों में हुआ है. इसकी एक बडी लंबी सूचि बनायी जा सकती है. लेकिन यहां मैं उदहारण के तौर पर कुछ नामों का उल्लेख करना चाहूंगा. आचार्य विजयानंद सूरी, आचार्य विजय इंद्र दिन्न सूरी, आचार्य योगीश, मुनि बुद्धिसागर, आचार्य विजय धर्म धुरंधर सूरी, मुनि मायाराम, उपाध्याय अमर मुनि, उपाध्याय ध्यान सागर, क्षुल्लक गणेशप्रसाद जी वर्णी, रमणीक मुनि, सुभद्र मुनि, कुलरत्न भूषणजी आदि.  

●  जैन मुनि हिन्दू धर्म का अच्छा ज्ञान रखते हैं, इसी प्रकार हिन्दू साधू भी जैन धर्म का अच्छा ज्ञान रखते हैं. 

● भारत की कई जातियां ऐसी हैं जिनमें जैन और हिंदू इन दोनों धर्मों के अनुयायी बडी संख्या में पाये जाते हैं, और उनमें विवाह संबंध भी होते रहते हैं. जैसे जाट, पटेल, अग्रवाल, खत्री, बंट, श्रीमाली ब्राम्हण, वक्कलिग गौडा, कासार, मातंग, लोहाना आदि.    

इस विषय के कई सारे पहलु है, जिस पर मैं अपने विचार लिखता रहूंगा. 

वैसे मैं यह जानना चाहूंगा  कि इस लेख के बारे में आप क्या सोचते हैं? कृपया नीचे कॉमेंट बॉक्स में आपके विचार लिखें. 

धन्यवाद !  

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रविवार, 19 सितंबर 2021

अब आप भी लिख सकते हैं जैन मिशन ब्लॉग के लिये!

अब आप भी लिख सकते हैं जैन मिशन ब्लॉग के लिये!

जैन मिशन ब्लॉग अल्प समय में लोकप्रिय हो गया है. यह रोज एक हजार से ज्यादा लोगों द्वारा पढा जाता है.  इस ब्लॉग पर जैन समाज और जैन इतिहास से संबधित ढेर सारे लेख प्रकाशित किये गए हैं. 

अगर आप एक लेखक हैं या लेखक/फ्रीलान्स पत्रकार बनना चाहते हैं, तो हम आपको इस ब्लॉग पर लिखने के लिए आमंत्रित करते हैं. 

आप निम्नलिखित विषयों पर लेख लिखकर हमें भेज सकते हैं:

● जैन समाज से संबधित जानकारीयुक्त या वैचारिक लेख 

● सामजिक जागरण से संबधित आपके विचार 

● जैन इतिहास से संबधित लेख 

● जैन छात्रों के लिए शिक्षा से संबधित लेख (छात्रवृत्तियां, होस्टल्स, जैन मायनॉरिटी शिक्षा संस्थाएं, करिअर आदि)  

● व्यवसाय व रोजगार से संबधित लेख 

● जैन समाज के सफल व्यवसायी, कलाकार, समाजसेवी, कार्यकर्ता आदि का परिचय, इंटरव्ह्यू आदि.    

● जैन तीर्थक्षेत्रों का परिचय, यात्रा वृत्त आदि.

● जैन आचार्य, मुनि और साध्वीजी के इंटरव्ह्यू, जीवन परिचय,  प्रवचन आदि. 

इसके अलावा आप संबधित विषयों के समाचार भी भेज सकते हैं. 

लेख, समाचार आदि हिंदी में हो. 

● सभी लेख, समाचार आदि आपके नाम से प्रकाशित किये जायेंगे और आप चाहते हैं तो साथ में आपके कॉन्टॅक्ट डिटेल्स भी (मोबाईल फोन नंबर, ईमेल आदि) दिए जाएंगे. 

● सभी लेखों का कॉपीराईट आपही के पास रहेगा 

लेख, फोटो आदि केवल ईमेल से ही भेज दें.  लेख, समाचार आदि युनिकोड हिंदी फॉन्ट में और वर्ड डॉक्युमेंट फ़ाइल में होने चाहिये. 

हमारा ईमेल पता:  jainway@gmail.com 

कृपया लेख आदि भेजने से पहले जैन मिशन ब्लॉग जरूर देखिये:

https://jainmission.blogspot.com/ 

अगर आप इस बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं, तो कृपया 91 844 632 4228 इस नंबर पर कॉल करें.  

  



जैन धर्म और वैदिक धर्म में क्या अंतर है?

महावीर सांगलीकर 

जैन और वैदिक भारत की दो प्राचीन विचार धाराएं और धर्म हैं. इन दोनों विचारधाराओं में, दोनों परंपराओं  में क्या बुनियादी अंतर है इसका विवेचन  मैं इस लेख में कर रहां हूं. (कृपया याद रहें कि 'जैन और वैदिक' का मतलब 'जैन और हिंदू' नहीं है.  हिन्दू का मतलब मुख्य रूप से शैव आदि होता है, जिनसे जैन धर्म की काफी समानताएं हैं. उनके बारे में मैं अलग से लिखूंगा)    

• जैन धर्म सर्वप्राचीन श्रमण संस्कृति से संबंधित है, जिसका मूल भारत की प्राचीन सिंधू सभ्यता में है, जब कि वैदिक धर्म ऋग्वेद और अन्य वेदों पर आधारित है, जो सिंधू सभ्यता जितने प्राचीन नहीं हैं.      

• जैन धर्म किसी ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता, और न ही मानता कि इस विश्व की रचना किसी ईश्वर ने की जब कि वैदिक धर्म के अनुसार इस विश्व का निर्माण ब्रम्हा ने किया. 

•  जैन धर्म के अनुसार मनुष्य अपने कर्मों का नाश कर भगवान बन सकता है, लेकिन वैदिक धर्म इसे नहीं मानता. 

• जैन धर्म सब मनुष्यों को समान मानता है, उनमें जाती या वर्ण के आधार पर भेदभाव नहीं करता, जब कि वैदिक धर्म मनुष्य में वर्ण और जाती के आधार पर भेदभाव करता है.  

• वैदिक  परंपरा में ब्राम्हणों को सबसे श्रेष्ठ मान गया है, जब कि जैन परंपरा में ब्राम्हणों को कोई विशेष दर्जा नहीं दिया गया है. 

• मूल वैदिक धर्म में आत्मा और पुनर्जन्म की संकल्पना नहीं है, लेकिन जैन धर्म में यह प्राचीन काल से है. 

• वैदिक धर्म में कर्मकांड का महत्व  है, जब कि  जैन धर्म में आत्मा और कर्म का महत्व है. 

• वैदिक धर्म में वेदों को प्रमाण माना गया है, जब कि जैन धर्म वेदों को प्रमाण नहीं मानता 

• जैन धर्म में अहिंसा का बडा महत्व है जब कि वैदिक धर्म में यज्ञों में हिंसा का समर्थन किया गया है. अश्वमेध यज्ञ इसका एक उदहारण है.   

• वैदिक धर्म के अनुसार  गाय की हत्या करना महापाप है, लेकिन जैन धर्म में गाय तो क्या, किसी भी प्राणी की हत्या करना महापाप है. 

• वैदिक धर्म के अनुसार ब्रम्हहत्या करना महापाप है, लेकिन जैन धर्म में किसी भी मनुष्य या प्राणी की हत्या करना महापाप माना गया है. 

• वैदिक धर्म के अनुसार मनुष्य को मुक्ति के लिए पुत्रप्राप्ति होना आवश्यक माना गया है. जैन धर्म इसे नहीं मानता. जैन धर्म के अनुसार मुक्ति के लिए अपने कर्मों के अच्छे-बुरे फलों से मुक्त होना आवश्यक माना गया है. 

• जैन धर्म मेँ स्त्रियों को प्राचीन काल से पुरुषों के समान अधिकार थे, लेकिन वैदिक धर्म ने स्त्रियों को शूद्र मानकर उनको उनके अधिकारों से वंचित रखा था. 

• जैन धर्म में प्राचीन काल से स्त्रियों को पिता की संपत्ति में समान अधिकार दिए गए है. वैदिक धर्म में स्त्री को यह अधिकार नहीं था. 

• वैदिक धर्म में स्त्रियों और शूद्रों को वेद पढने के अधिकार नहीं थे, लेकिन जैन धर्म में सभी लोग चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, ब्राम्हण हो या शूद्र, आगम ग्रंथ  पढ़  सकते थे.  

• वैदिक धर्म पर ब्राम्हणों का एकाधिकार है, जब कि जैन धर्म पर किसी भी एक जातिविशेष का एकाधिकार नहीं है. 

• जैन धर्म ने स्त्री शिक्षा का हमेशा समर्थन किया. यह परंपरा जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव ने अपनी कन्याएं ब्राम्ही और सुंदरी को लिपि और गणित की शिक्षा देकर शुरू की थी. वैदिक धर्म ने स्त्रियों की शिक्षा का विरोध किया है.  

• वैदिक पद्धति से किये जानेवाले विवाह में कन्या का दान किया जाता है, जब कि जैन पद्धति से किये जाने वाले विवाह में कन्यादान नहीं किया जाता. जैन मान्यता के अनुसार कन्या कोई वस्तु नहीं है जिसे दान किया जाय. 

• जैन धर्म के प्राचीन आगम ग्रंथ उस समय की अर्ध मागधी, शौरसेनी आदि लोक भाषाओं में लिखे गये, बाद के ग्रंथ महाराष्ट्री, तमिल, कन्नड  आदि लोकभाषाओँ में लिखे गए. वैदिक परंपरा के ग्रंथ केवल और केवल संस्कृत भाषा में ही लिखे गये, जो लोकभाषा नहीं थी. 

• जैन धर्म के प्राचीन पुरातत्वीय अवशेष बड़ी संख्या में भारत भर में फैले हुए हैं (जैसे कि शिलालेख, मूर्तियां, गुफाएं आदि), लेकिन वैदिक धर्म का  एक भी प्राचीन पुरातत्वीय अवशेष उपलब्ध नहीं है.  

• वैदिक धर्म में ईश्वर की पूजा उसको खुश कर उससे लौकिक चीजे पाने के लिए की जाती है, जब कि जैन धर्म में भगवान की पूजा भगवान  के गुणों के स्मरण के लिए और उसके जैसा बनने के लिए की जाती है. 

• वैदिक धर्म में मूर्तिपूजा नहीं है, ना ही उनके कोई मंदिर होते हैं, जब कि मंदिर और  मूर्तिपूजा जैन धर्म की देन है. यही कारण है कि वैदिक देवताओं के कोई प्राचीन मंदिर या मूर्तियां दिखाई नहीं देती है. इसके उलटे पूरे  भारत में प्राचीन जैन मंदिरों के अवशेष दिखाई देते हैं. 

• वैदिक धर्म और झोरेस्ट्रियन (पारसी धर्म) में कई समानताएं हैं. यह दोनों धर्म अग्निपूजक हैं. वैदिकों के ऋग्वेद  और पारसियों के अवेस्ता इस ग्रन्थ की कई ऋचाओं  में समानताएं पाई जाती है. लेकिन इस प्रकार की कोई समानता जैन और झोरेस्ट्रियन में दिखाई नहीं देती. 

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शनिवार, 11 सितंबर 2021

जैन धर्म पुराना है या हिन्दू धर्म?

 महावीर सांगलीकर


जैन धर्म और हिन्दू धर्म की प्राचीनता पर हमेशा बहस होती रहती है.  दोनों पक्ष आपने-अपने धर्म के प्राचीन होने पर जोर देते रहते हैं. 

कौनसा धर्म पुराना है? जैन या हिंदू? यह सवाल अपने आप में एक गलत सवाल है. क्यों कि जैसे कि मैंने इससे पहले लिखा है, हिन्दू का मतलब शैव, वैष्णव, शाक्त, स्मार्त, वारकरी आदि है. यह सभी धर्म-संप्रदाय  एक ही समय उत्पन्न नहीं हुए. इनमें से कुछ अतिप्राचिन हैं, और कुछ बाद में उत्पन्न हो गए. इसलिए जैन धर्म पुराना है या हिंदू धर्म पुराना है  इस प्रकार का  प्रश्न पूछने के बजाय जैन धर्म पुराना है या शैव धर्म पुराना है, अथवा  जैन धर्म पुराना है या वैष्णव धर्म पुराना है इस प्रकार का प्रश्न पूछना ज्यादा ठीक रहेगा. 

चूं कि हिंदू धर्म के अंतर्गत आनेवाले धर्मों में शैव धर्म सब से पुराना है, इस लेख  में हम इस बात की चर्चा करेंगे कि जैन धर्म पुराना है या शैव धर्म पुराना है. 

जिस  प्रकार जैन धर्म की प्राचीनता सिंधु घाटी की सभ्यता तक जाती है, उसी प्रकार शैव धर्म की प्राचीनता भी सिंधु घाटी की सभ्यता तक जाती है.  सिंधु घाटी के जो अवशेष मिले है, उसमें एक नग्न योगी की प्रतिमा मिलती है. इसे एक ओर  जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की प्रतिमा माना जाता है, तो दूसरी और इसे भगवान शिव की प्रतिमा भी माना जाता है. अब जब हम यह जानते है कि भगवान ऋषभदेव और भगवान  शिव में कई समानतायें हैं,  कहा जा सकता है कि शिव और ऋषभ एक ही है. दोनों को ही आदिनाथ कहा जाता है. इसका मतलब यह हुआ कि जैन और शैव परंपरा के आदिपुरुष यह आदिनाथ ही थे. इस बारे में मैं अलग से और विस्तार से लिखूंगा. 

यहां मेरे कहने का मतलब यह है कि जैन और शैव परंपरा दोनों अतिप्राचीन हैं, और दोनों का मूल भी एक है. लेकिन आगे चलकर मूल परंपरा की दो शाखायें बन गयी. अब आपको तय करना है कि जैन धर्म पुराना है या शैव धर्म पुराना है! 

हिन्दू धर्म के अंतर्गत आने वाले वैष्णव आदि धर्म शैव धर्म के काफी बाद उत्पन्न हुए. इसलिए वह सभी धर्म और संप्रदाय जैन धर्म से प्राचीन नहीं हो सकते. 

क्या वैदिक धर्म प्राचीन है? 

अब सवाल यह है कि क्या वैदिक धर्म जैन और शैव धर्म से प्राचीन है? 

वैदिकों के अनुसार ऋग्वेद दुनिया का सब से प्राचीन ग्रंथ है. इसलिए उनके अनुसार वैदिक धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है. लेकिन वास्तविकता तो यह है कि  वैदिक धर्म और वैदिक संस्कृति की प्राचीनता का एक भी पुरातत्वीय साक्ष्य नहीं है! ना ही सिंधु सभ्यता में इसके अस्तित्व का कोई प्रमाण है, और ना ही इस धर्म के कोई प्राचीन शिलालेख आदि पाए जाते हैं. इसलिए वैदिक धर्म जैन और शैव धर्म से प्राचीन नहीं हो सकता. ध्यान देने योग्य एक बात यह है कि जैन और शव धर्म दोनों में मूर्तिपूजा का महत्त्व है, जब कि वैदिक धर्म में मूर्तिपूजा नहीं है. आज के वैदिक लोग मूर्तिपूजा करते हैं इसका कारण वैदिक धर्म पर जैन और शव धर्म का गहरा प्रभाव पडना यह है. 

खैर, हमें प्राचीनता के बारे में ज्यादा विचार नहीं करना चाहिये. किसी धर्म के प्राचीन होने का या ना होने का विचार करने के बजाय आज उस धर्म की प्रासंगिकता क्या है इसके बारे में सोचना चाहिये. इस बात पर भी गौर करना चाहिये कि आपका धर्म सबसे प्राचीन है इसका मतलब यह नहीं की आपके प्राचीन पूर्वज भी उसी धर्म के अनुयायी थे.  इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए की सभी धर्मो का एक दूसरे पर गहरा प्रभाव पड़ा है. यह भी ध्यान रखें कि आजके जैन और वैदिक धर्म अपने मूल रूप में नहीं हैं , उनमें काफी बदलाव हो चुके हैं.  

धर्मपरिवर्तन प्राचीन काल से होता रहा है और आगे भी होता रहेगा. आज की कई हिंदू जातियां किसी काल में जैन धर्म की अनुयायी थी, और आज की कई जैन जातियां हिंदू से जैन बनी है. मेरे आगे आनेवाले लेखों में इस तथ्य पर विस्तार से प्रकाश डाला जायेगा.  

यहां इस बात पर ध्यान देना भी योग्य रहेगा कि प्राचीनता का मोह भारतीय धर्मों के अनुयायीं में ही दिखाई देता है. पश्चिमी धर्मों के अनुयायी प्राचीनता को महत्त्व नहीं देते.  

हमें अपने धर्म के प्राचीनता के बारे में नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचना चाहिये.  मान लिया कि आपका धर्म दुनिया में सबसे प्राचीन है, आदिमानव भी इसका पालन करते थे, लेकिन क्या आप अपने धर्म का पालन करते है? क्या आपको अपने धर्म की बुनियादी जानकारी है? क्या आपकी अगली पीढ़ियां इसका पालन करने वाली हैं? 

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सोमवार, 30 अगस्त 2021

तुलुनाडु के चौटा राजवंश का इतिहास

©  महावीर सांगलीकर 

कर्नाटक और केरल के तुलु भाषी क्षेत्र को तुलुनाडु के नाम से जाना जाता है. तुलनाडु कर्नाटक में दक्षिण कॅनरा व उडपी जिले और केरल में कासरगोड जिले क्षेत्र के अंतर्गत आता हैं. चौटा राजवंश मध्यकाल के सबसे महत्वपूर्ण राजवंशों में से एक है. चौटा जैन धर्म के अनुयायी थे. 

चौटा राजवंश ने सं 1160 से 1867 ईस्वी तक यानी 700 सालों तक इस क्षेत्र पर शासन किया. चौटा वंश के सत्ता में आने से पहले इस क्षेत्र पर होयसल वंश के राजा विष्णुवर्धन का शासन था. दरअसल, विष्णुवर्धन के शासन की स्थापना से पहले भी इस क्षेत्र पर चौटाओं के पूर्वजों का शासन था.

विष्णुवर्धन की मृत्यु के बाद तिरुमल राया (प्रथम) ने 1160  ईस्वी में राज्य वापस पा लिया और इस क्षेत्र में चौटाओं की शक्ति फिर से स्थापित हो गई. तिरुमल राया ने उल्लाल के निकट सोमेश्वर गांव से शासन किया. तिरुमल राया जैन धर्म का अनुयायी था. सोमेश्वर इस गांव की ग्रामदेवता सोमनाथ थी. इसलिए तिरुमल राया ने इस ग्रामदेवता का अपने कुलदेवता के रूप में स्वीकार किया. 

उल्लाल में एक महल का निर्माण करते समय तिरुमल राया को एक विशाल गुप्त खजाना मिला उसने इस खजाने का उपयोग अपने राज्य को ठीक-ठाक करने के लिए किया. 

चौताओं की राजधानी उल्लाल के किले के अवशेष 

1179 इसवी में तिरुमल राया (प्रथम) की मृत्यु हो गई. उसका दामाद चेन्नराया (प्रथम) उसका उत्तराधिकारी बन गया. चेन्नराया का दामाद था वरदैय्या. वरदैय्या एक बहुत ही चतुर प्रशासक और एक शक्तिशाली सेनापति था. वह महत्वाकांक्षी भी था. उसने चौटा राज्य का विस्तार करने के लिए विशेष बल जुटाना शुरू किया. उसकी योजना देखकर पड़ोसी बल्लाल राजा ने चौटा राज्य पर आक्रमण कर दिया. इस युद्ध में वरदैया ने राजा बल्लाल को हरा दिया और उसका राज्य चौटा राज्य में मिला दिया. 

इस जीत से वरदैय्या की महत्वाकांक्षा बढ गयी. उसने दो पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण किया और उन्हें पराजित किया और उन्हें भी चौटा राज्य में शामिल कर दिया. उसी समय, मिजारा के राजा चेन्नप्पा ने महसूस किया कि  अब उसकी बारी है. उसने चौटा राज्य पर आक्रमण करने का फैसला किया. चेन्नराया को यह खबर मिली और इसके पहले कि चेन्नप्पा आक्रमण करें, चेन्नराया ने मिजारा पर एक बड़ा हमला किया. इसमें चेन्नप्पा की हार हुई. मिजारा राज्य भी अब चौटा राज्य का हिस्सा बन गया. 

इस प्रकार चेन्नराया (प्रथम) के शासनकाल के दौरान उसने और उसके दामाद वरदैया ने चौटा राज्य का विस्तार किया. राज्य के विस्तार के बाद चेन्नराया  ने प्रशासन, राजस्व और रक्षा प्रणाली में कई सुधार किए. उसने चौटा राज्य की रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए एक विशेष आदेश जारी किया उस आदेश के अनुसार राज्य के हर घर के एक व्यक्ति को युद्ध के दौरान सेना में भर्ती होना अनिवार्य था. 

1219 इसवी में चेन्नराया (प्रथम) की मृत्यु हो गयी. उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद वरदैय्या चौटा राज्य का राजा बन गया. राज्याभिषेक के बाद वह चौटा  देवराया इस नाम से जाना जाने लगा. 

चौटा राजवंश के सात सौ साल के इतिहास में कुल 20 व्यक्तियों ने शासन किया.

चौटा राजवंश में मातृसत्ताक व्यवस्था थी. इस व्यवस्था कुछ अलग प्रकार की थी. इस व्यवस्था में राजा के बाद उसका बेटा राज्य का वारिस नहीं बन जाता था, बल्कि दामाद, बेटी, बहू, भांजी या भांजे को राज्य का वारिस बना दिया जाता था. बहू आमतौर पर भांजी ही होती थी. इस क्षेत्र में भांजी या ममेरी बहन के  साथ विवाह करने की प्रथा थी. 

चौटा राजवंश में 11 राजाओं और 9 रानियों ने राज किया. यह  नौ रानियां या तो उनके पहले के राजा/ रानी की बेटियां थी, बहुएं थी या भांजिया थी.  

इसी चौटा राजवंश में आगे चलकर अबक्का नाम की पराक्रमी रानी हुयी, जिसने पर्तुगालियों को जमिनी  और समुद्री लड़ाईयों में कई बार पराजित किया और उन्हें दक्षिण भारत में राज्य विस्तार करने से रोक दिया. इस रानी के कारण पर्तुगालियों का राज्य गोवा तक ही सिमित रह गया. इस पराक्रमी अबक्का रानी के बारे में मैं एक अलग लेख लिखूंगा. 

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