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बुधवार, 27 जुलाई 2022

सम्राट अशोक और उसका बौद्ध धर्मान्तरण

© महावीर सांगलीकर

 

सम्राट अशोक यह मौर्य राजवंश का तिसरा सम्राट था. वह मौर्य राजवंश के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त का पोता, और सम्राट बिंदुसार का पुत्र था. 

सम्राट अशोक ने अपने पडोसी राज्य कलिंग पर आक्रमण किया था. इस युद्ध में दोनों तरफ के लाखों सैनिक मारे गये.  इस कारण अशोक के मन में हिंसा के प्रति नफरत तैयार हो गयी और उसने बौद्ध धर्म का अंगीकार किया, ऐसा माना जाता है. 

यहां गौर करने लायक एक विशेष बात यह कि बौद्ध धर्म का अंगीकार करने से पहले सम्राट अशोक किस धर्म का अनुयायी था इस बात की चर्चा कोई नहीं करता. कई लोग  सोच सकते हैं कि सम्राट अशोक ने हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म  को अपनाया. लेकिन उस समय (और आगे भी हजारों साल) हिन्दू नाम का कोई धर्म अस्तित्व में ही नहीं था. मगध साम्राज्य  में उस समय जैन, बौद्ध, आजीवक, ब्राह्मण (वैदिक) आदि धर्म थे. बौद्ध धर्म अपनाने से पहले सम्राट अशोक का वैदिक ब्राह्मण होने का कोई सवाल ही नहीं उठता. ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि पहले सम्राट अशोक या तो जैन था, या फिर आजीवक. 

लेकिन क्या सम्राट अशोक सचमुच अस्तित्व में था? अगर था, तो क्या उसने बौद्ध धर्म को सचमुच अपनाया था? सच कुछ और है. 

सम्राट अशोक नाम का कोई राजा वास्तव में अस्तित्व में था, कलिंग के युद्ध में हिंसा के कारण सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया यह कहानी केवल बौद्ध धर्म के कुछ ग्रंथों में उपलब्ध है. इस कहानी का समर्थन करने वाला दूसरा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. जिन्हें अशोक के शिलालेख कहा जाता है, ऐसे किसी भी शिलालेख में अशोक नाम का दिखाई नहीं देता है. इन शिलालेखों के अनुसार जिसने वह लिखे उसका नाम  ‘देवानाम पियं पियदस्सी’ था. बौद्ध ग्रन्थ पियदस्सी को ही सम्राट अशोक मानते हैं, लेकिन इस मानाने के पीछे कोई तर्क या प्रमाण नहीं है. वास्तव में  पियदस्सी के किसी भी शिलालेख के अनुसार सिद्ध नहीं किया जा सकता की उसने बौद्ध धर्म को अपनाया था. 

जिन्हें सम्राट अशोक के शिलालेख कहा जाता है, वह सारे के सारे सम्राट अशोक ने ही लिखवाये थे इस बात के लिए आधुनिक इतिहासकार मानने के लिए तैयार नहीं है, क्यों कि इन विभिन्न शिलालेखों के कालक्रम में बडा अन्तर है. 

समकालीन बौद्ध, जैन और वैदिक ग्रंथों में और विदेशी यात्रियों के यात्रावृत्तों में अशोक का कोई उल्लेख नहीं है. सम्राट अशोक की कथा सबसे पहले 'अशोकवदन' इस बौद्ध ग्रन्थ में पायी जाती है,  जो इसा की दूसरी सदी में लिखा गया था, यानि कथित सम्राट अशोक के पांच शताब्दियों बाद! का . उसके बाद चौथी सदी के महावंश और पांचवी सदी के दीपवंश इन बुद्ध ग्रंथों में सम्राट अशोक की कथा पायी जाती है. यह सारे ग्रन्थ समकालीन न होने के कारण और इनमें दी गयी जानकारी के कोई बाहरी प्रमाण न होने के कारण हम सम्राट अशोक की कहानी को प्रामणिक नहीं मान सकते. 

प्राचीन जैन ग्रंथों में मौर्य राजवंश के चन्द्रगुप्त, बिन्दुसार, कुणाल, सम्प्रति का और मगध के कई अन्य प्रमुख लोगों का विस्तार से वर्णन है, लेकिन अशोक का वर्णन नहीं है ऐसा क्यों?

गौर करने लायक एक महत्वपूर्ण बात यह है कि समकालीन ग्रीक इतिहास में  सम्राट चन्द्रगुप्त के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन ग्रीक स्रोत देखील सम्राट अशोकाचा कोई उल्लेख नहीं करते. 

यह सारी बातें सम्राट अशोक के अस्तित्व पर ही सवाल खडा कर देते हैं.  




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शनिवार, 11 सितंबर 2021

जैन धर्म पुराना है या हिन्दू धर्म?

 महावीर सांगलीकर


जैन धर्म और हिन्दू धर्म की प्राचीनता पर हमेशा बहस होती रहती है.  दोनों पक्ष आपने-अपने धर्म के प्राचीन होने पर जोर देते रहते हैं. 

कौनसा धर्म पुराना है? जैन या हिंदू? यह सवाल अपने आप में एक गलत सवाल है. क्यों कि जैसे कि मैंने इससे पहले लिखा है, हिन्दू का मतलब शैव, वैष्णव, शाक्त, स्मार्त, वारकरी आदि है. यह सभी धर्म-संप्रदाय  एक ही समय उत्पन्न नहीं हुए. इनमें से कुछ अतिप्राचिन हैं, और कुछ बाद में उत्पन्न हो गए. इसलिए जैन धर्म पुराना है या हिंदू धर्म पुराना है  इस प्रकार का  प्रश्न पूछने के बजाय जैन धर्म पुराना है या शैव धर्म पुराना है, अथवा  जैन धर्म पुराना है या वैष्णव धर्म पुराना है इस प्रकार का प्रश्न पूछना ज्यादा ठीक रहेगा. 

चूं कि हिंदू धर्म के अंतर्गत आनेवाले धर्मों में शैव धर्म सब से पुराना है, इस लेख  में हम इस बात की चर्चा करेंगे कि जैन धर्म पुराना है या शैव धर्म पुराना है. 

जिस  प्रकार जैन धर्म की प्राचीनता सिंधु घाटी की सभ्यता तक जाती है, उसी प्रकार शैव धर्म की प्राचीनता भी सिंधु घाटी की सभ्यता तक जाती है.  सिंधु घाटी के जो अवशेष मिले है, उसमें एक नग्न योगी की प्रतिमा मिलती है. इसे एक ओर  जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की प्रतिमा माना जाता है, तो दूसरी और इसे भगवान शिव की प्रतिमा भी माना जाता है. अब जब हम यह जानते है कि भगवान ऋषभदेव और भगवान  शिव में कई समानतायें हैं,  कहा जा सकता है कि शिव और ऋषभ एक ही है. दोनों को ही आदिनाथ कहा जाता है. इसका मतलब यह हुआ कि जैन और शैव परंपरा के आदिपुरुष यह आदिनाथ ही थे. इस बारे में मैं अलग से और विस्तार से लिखूंगा. 

यहां मेरे कहने का मतलब यह है कि जैन और शैव परंपरा दोनों अतिप्राचीन हैं, और दोनों का मूल भी एक है. लेकिन आगे चलकर मूल परंपरा की दो शाखायें बन गयी. अब आपको तय करना है कि जैन धर्म पुराना है या शैव धर्म पुराना है! 

हिन्दू धर्म के अंतर्गत आने वाले वैष्णव आदि धर्म शैव धर्म के काफी बाद उत्पन्न हुए. इसलिए वह सभी धर्म और संप्रदाय जैन धर्म से प्राचीन नहीं हो सकते. 

क्या वैदिक धर्म प्राचीन है? 

अब सवाल यह है कि क्या वैदिक धर्म जैन और शैव धर्म से प्राचीन है? 

वैदिकों के अनुसार ऋग्वेद दुनिया का सब से प्राचीन ग्रंथ है. इसलिए उनके अनुसार वैदिक धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है. लेकिन वास्तविकता तो यह है कि  वैदिक धर्म और वैदिक संस्कृति की प्राचीनता का एक भी पुरातत्वीय साक्ष्य नहीं है! ना ही सिंधु सभ्यता में इसके अस्तित्व का कोई प्रमाण है, और ना ही इस धर्म के कोई प्राचीन शिलालेख आदि पाए जाते हैं. इसलिए वैदिक धर्म जैन और शैव धर्म से प्राचीन नहीं हो सकता. ध्यान देने योग्य एक बात यह है कि जैन और शव धर्म दोनों में मूर्तिपूजा का महत्त्व है, जब कि वैदिक धर्म में मूर्तिपूजा नहीं है. आज के वैदिक लोग मूर्तिपूजा करते हैं इसका कारण वैदिक धर्म पर जैन और शव धर्म का गहरा प्रभाव पडना यह है. 

खैर, हमें प्राचीनता के बारे में ज्यादा विचार नहीं करना चाहिये. किसी धर्म के प्राचीन होने का या ना होने का विचार करने के बजाय आज उस धर्म की प्रासंगिकता क्या है इसके बारे में सोचना चाहिये. इस बात पर भी गौर करना चाहिये कि आपका धर्म सबसे प्राचीन है इसका मतलब यह नहीं की आपके प्राचीन पूर्वज भी उसी धर्म के अनुयायी थे.  इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए की सभी धर्मो का एक दूसरे पर गहरा प्रभाव पड़ा है. यह भी ध्यान रखें कि आजके जैन और वैदिक धर्म अपने मूल रूप में नहीं हैं , उनमें काफी बदलाव हो चुके हैं.  

धर्मपरिवर्तन प्राचीन काल से होता रहा है और आगे भी होता रहेगा. आज की कई हिंदू जातियां किसी काल में जैन धर्म की अनुयायी थी, और आज की कई जैन जातियां हिंदू से जैन बनी है. मेरे आगे आनेवाले लेखों में इस तथ्य पर विस्तार से प्रकाश डाला जायेगा.  

यहां इस बात पर ध्यान देना भी योग्य रहेगा कि प्राचीनता का मोह भारतीय धर्मों के अनुयायीं में ही दिखाई देता है. पश्चिमी धर्मों के अनुयायी प्राचीनता को महत्त्व नहीं देते.  

हमें अपने धर्म के प्राचीनता के बारे में नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचना चाहिये.  मान लिया कि आपका धर्म दुनिया में सबसे प्राचीन है, आदिमानव भी इसका पालन करते थे, लेकिन क्या आप अपने धर्म का पालन करते है? क्या आपको अपने धर्म की बुनियादी जानकारी है? क्या आपकी अगली पीढ़ियां इसका पालन करने वाली हैं? 

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